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“बीमार ग़रीब जाए कहाँ? सरकारी अस्पताल बदहाल, प्राइवेट बेहिसाब!”

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देश में ‘स्वास्थ्य सबका अधिकार’ कहने वाली सरकारें क्या सच में सबका इलाज मुहैया करा पा रही हैं? सरकारी अस्पतालों में इलाज की जो हालत है, वह आज भी सवालों के घेरे में है। एसी कमरे, फाइव स्टार सुविधाएं, एक कॉल पर डॉक्टर — ये सब तो प्राइवेट अस्पतालों की पहचान बन चुकी हैं। लेकिन वही आम आदमी, जो रोज़ कमाता है और रोज़ खाता है, उसके लिए सरकारी अस्पतालों में घंटों इंतजार, टूटी स्ट्रेचर, गंदे वॉशरूम और डॉक्टरों की कमी एक कड़वी हकीकत है।

कहां है ‘जनता का अस्पताल’?

सरकारी अस्पताल कभी “जनता का सहारा” माने जाते थे। आज ये अस्पताल खुद वेंटिलेटर पर नज़र आते हैं।

  • डॉक्टरों की भारी कमी।
  • एक बेड पर दो मरीज़।
  • मशीनें सालों से खराब।
  • दवाएं ‘फ्री’ के नाम पर ‘गायब’।
  • मरीजों को खुद इंजेक्शन तक खरीदने की मजबूरी।

प्राइवेट अस्पताल – इलाज या व्यापार?

ग़रीब मरीज़ जब सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए भटकता है, और वहां से मायूस होकर प्राइवेट अस्पताल जाता है, तो वहां उसका इलाज से ज़्यादा ‘बिल’ बनता है। इलाज तो होता है — लेकिन जेब खाली करके, ज़मीन गिरवी रखकर, कभी-कभी कर्ज लेकर।

सरकार कब जागेगी?

हर साल बजट में हेल्थ सेक्टर को मोटी रकम दी जाती है, लेकिन नतीजे ज़मीन पर दिखते नहीं। सवाल ये है कि अगर सरकारी अस्पतालों को प्राइवेट जैसा बनाने का सपना सरकार देखती है, तो हकीकत कब बदलेगी?

क्या सिर्फ़ ‘आयुष्मान कार्ड’ से होगा इलाज?

सरकारी योजनाएं अच्छी हैं, लेकिन क्रियान्वयन ज़मीन पर ज़ीरो है। ग़रीब मरीज़ को कार्ड तो मिल जाता है, पर अस्पताल में उसका ‘स्वागत’ नहीं।

अगर इलाज भी अमीर-ग़रीब में बंट जाएगा, तो समाज का ढांचा चरमरा जाएगा। सरकार को चाहिए कि वह स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे, अस्पतालों में डॉक्टरों की भर्ती हो, सुविधाएं बढ़ें और जवाबदेही तय हो। वरना ग़रीब जनता प्राइवेट अस्पतालों के हाथों लुटती रहेगी।

आम आदमी को इलाज के लिए या तो महीनों इंतजार करना पड़ता है, या फिर कर्ज़ लेकर प्राइवेट अस्पताल की चौखट चूमनी पड़ती है। ऐसे में ग़रीब आदमी जाए तो जाए कहाँ?

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जनता पूछ रही है – कब जागेगी सरकार?

क्यों नहीं सरकार स्वास्थ्य को प्राथमिकता देती? क्यों नहीं हर ज़िले में एक ऐसा सरकारी अस्पताल हो, जहाँ आम आदमी को भी वही इलाज मिले जो अमीर को प्राइवेट में मिलता है?

क्या स्वास्थ्य अब सिर्फ पैसे वालों का हक़ रह गया है?

जब तक इस व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, तब तक ग़रीब सिर्फ कतार में खड़ा रहेगा और अमीर एसी रूम में इलाज कराता रहेगा।

Faizan Khan Faizy Editorial Advisor

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