
देहरादून
प्रदेश में फर्ज़ी प्रमाणपत्र बनाने वाले दलालों पर सरकार और पुलिस की लगातार कार्रवाई जारी है। हाल के दिनों में कई ऐसे गिरोह पकड़े गए हैं जो जाति, निवास, आय, जन्म और अन्य सरकारी प्रमाणपत्रों को मोटी रकम लेकर जाली तरीके से तैयार करवा रहे थे। पुलिस इन्हें “मास्टरमाइंड” बताकर कार्रवाई का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन बड़ा सवाल अब भी जस का तस खड़ा है।
जब तक किसी सरकारी अधिकारी के हस्ताक्षर, आईडी या सिस्टम एक्सेस के बिना ये प्रमाणपत्र बन ही नहीं सकते, तो फिर असली गुनहगार कौन है?
👉 बिना अफसरों की मिलीभगत के फर्ज़ी प्रमाणपत्र कैसे बने?
फर्ज़ी प्रमाणपत्र कोई सड़क किनारे छपने वाला कागज़ नहीं होता।
इसके लिए चाहिए—
• सरकारी पोर्टल का लॉगिन
• विभागीय सील
• सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर
• और रिकॉर्ड में विधिवत एंट्री
ऐसे में यह मानना कि सिर्फ दलाल ही दोषी हैं, प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। साफ है कि इस पूरे खेल में कुछ “अंदरखाने के खिलाड़ी” भी सक्रिय हैं।
👉 सिर्फ मोहरे पकड़े जा रहे, असली खिलाड़ी आज़ाद?
अब तक की कार्रवाइयों में अधिकतर मामलों में
• कंप्यूटर ऑपरेटर
• बिचौलिए
• प्राइवेट एजेंट
पकड़े गए, लेकिन
जिन अधिकारियों की अनुमति, संस्तुति या डिजिटल एक्सेस से ये प्रमाणपत्र बने, उन पर कार्रवाई न के बराबर है।
यह स्थिति जनता के बीच इस आशंका को जन्म दे रही है कि
“क्या निचले स्तर के दलालों को बलि का बकरा बनाकर बड़े अधिकारियों को बचाया जा रहा है?”
जांच करेगा कौन? जवाब देगा कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि
• जिन अधिकारियों के सिस्टम से प्रमाणपत्र बने
• जिनकी आईडी से लॉगिन हुआ
• जिनके हस्ताक्षर दस्तावेज़ों पर मौजूद हैं
उनकी भूमिका की जांच कौन करेगा?
क्या यह जांच:
• विजिलेंस करेगा?
• एसआईटी बनेगी?
• या फिर विभागीय जांच में मामला दबा दिया जाएगा?
👉 भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ सिर्फ नारा?
सरकार बार-बार “भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस” का दावा करती है, लेकिन जब तक
• दोषी अधिकारियों के खिलाफ निलंबन
• बर्खास्तगी
• और आपराधिक मुकदमे
नहीं होते, तब तक यह दावा केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।
👉 फर्ज़ी प्रमाणपत्र से कौन-कौन नुकसान उठा चुका है?
इन जाली दस्तावेज़ों के ज़रिए कई लोग:
• सरकारी नौकरियों में घुसे
• योजनाओं का गलत लाभ लिया
• और वास्तविक पात्र लोगों का हक़ मारा
यह केवल कागज़ी अपराध नहीं, बल्कि सीधा-सीधा सामाजिक और आर्थिक अन्याय है।
उत्तराखंड में फर्ज़ी प्रमाणपत्र रैकेट का असली चेहरा तभी बेनकाब होगा जब
दलालों के साथ-साथ उन सरकारी अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई होगी, जिनकी मिलीभगत के बिना यह गोरखधंधा संभव ही नहीं था।


