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राजधानी में अफसर बने ठेकेदार! सरकारी कामों पर अंदरखाने कब्जा

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देहरादून

राजधानी के कई विभागों में एक चौंकाने वाली व्यवस्था सामने आ रही है — जहां काम कराने वाले अधिकारी ही काम खाने वाले बन बैठे हैं। आरोप है कि कुछ विभागों में जिम्मेदार पदों पर बैठे अफसर नियमों को दरकिनार कर खुद ही ठेकेदार की भूमिका निभा रहे हैं और असली ठेकेदारों के हिस्से के कार्य भी अपने प्रभाव से कब्जा कर रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार कई विकास कार्यों, मरम्मत, सप्लाई और छोटे-बड़े निर्माण कार्यों में टेंडर प्रक्रिया सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाती है। अंदरखाने सेटिंग के जरिए काम उन्हीं लोगों को दिया जाता है जो अधिकारियों के करीबी होते हैं, जबकि कई मामलों में अधिकारी खुद अपने लोगों या फर्जी फर्मों के माध्यम से काम करवाकर भुगतान निकाल रहे हैं।

टेंडर, बिल और भुगतान पर सवाल

बताया जा रहा है कि:

  • कई काम बिना उचित प्रतिस्पर्धा के आवंटित हो रहे हैं
  • माप पुस्तिका (एमबी) और गुणवत्ता जांच औपचारिकता बन गई है
  • छोटे ठेकेदारों को किनारे कर भुगतान सीधे “फिक्स” लोगों तक पहुंच रहा है

छोटे और स्थानीय ठेकेदारों का आरोप है कि उन्हें काम मिलने से पहले ही बता दिया जाता है — “ऊपर से तय है”। कई लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि शिकायत करने पर ब्लैकलिस्ट करने की धमकी तक मिलती है।

सरकार की छवि पर असर

जानकारों का कहना है कि यदि अधिकारी ही ठेकेदारी करने लगें तो पारदर्शिता खत्म होना तय है। इससे न सिर्फ सरकारी धन की गुणवत्ता पर असर पड़ता है बल्कि ईमानदार ठेकेदारों का सिस्टम से भरोसा भी उठता है।

जांच और कार्रवाई की मांग

शहर के व्यापारिक और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि:

  • सभी विभागों के टेंडरों की विजिलेंस/थर्ड पार्टी ऑडिट से जांच हो
  • पिछले कार्यों के भुगतान और गुणवत्ता की पड़ताल की जाए
  • दोषी पाए जाने पर निलंबन और आपराधिक मुकदमा दर्ज हो

लोगों का कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो सरकारी योजनाएं “जनहित” से ज्यादा “जुगाड़ हित” बन जाएंगी।

अब देखना होगा — क्या प्रशासन इस अफसर-ठेकेदार गठजोड़ पर सख्त वार करेगा या फाइलों में ही दब जाएगी सच्चाई?

हमारे चैनल के माध्यम से जल्द ही ऐसे अधिकारियों के नाम आयेंगे सामने?

Faizan Khan Faizy Editorial Advisor

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