
राजधानी देहरादून कभी अपनी शांति, सुकून और सुरक्षित माहौल के लिए जानी जाती थी। लेकिन पिछले कुछ समय में लगातार सामने आ रहे हत्या और फायरिंग जैसे संगीन मामलों ने शहर की छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि लोग अब दिन-दहाड़े बाहर निकलने में भी असहज महसूस कर रहे हैं।
ताज़ा घटनाओं ने लोगों के मन में डर बैठा दिया है — जिम के बाहर गोलीकांड, बाज़ार क्षेत्र में हत्या, सड़क किनारे हमले… अपराधियों का दुस्साहस साफ दिख रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब अपराधी पुलिस से नहीं, बल्कि पुलिस अपराधियों से डरती नजर आ रही है।
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क्या कम हो गया पुलिस का खौफ?
लोगों का आरोप है कि
• अपराधी खुलेआम हथियार लेकर घूम रहे
• भीड़भाड़ वाले इलाकों में वारदात
• कई मामलों में गिरफ्तारी में देरी
• पुलिस गश्त सिर्फ कागजों में
पहले छोटी सी घटना पर तुरंत एक्शन होता था, अब हत्या जैसे मामलों में भी पुलिस सिर्फ प्रेस नोट जारी करती दिखती है — ऐसा जनता का कहना है।
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सरकार और पुलिस पर सवाल
प्रदेश के पुलिस मुखिया डीजीपी दीपम सेठ और जिले के कप्तान अजय सिंह की कार्यप्रणाली को लेकर भी चर्चा तेज है।
लोगों का आरोप है कि:
• अपराध रोकने से ज्यादा फोकस सोशल मीडिया प्रचार पर
• चेकिंग अभियान दिखावे तक सीमित
• धरातल पर खुफिया तंत्र कमजोर
• हिस्ट्रीशीटर बेखौफ
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‘शांत शहर’ की बदलती पहचान
एक समय था जब देहरादून में रात 11 बजे भी लोग निश्चिंत होकर घूमते थे। अब हालात यह हैं कि:
• परिवार शाम के बाद बच्चों को बाहर नहीं भेज रहे
• व्यापारियों में असुरक्षा
• कॉलोनियों में निजी गार्ड बढ़े
• व्हाट्सएप ग्रुप में संदिग्धों की फोटो शेयर
शहर की पहचान “एजुकेशन हब” से हटकर “क्राइम स्पॉट” बनने का डर लोगों में साफ दिखाई दे रहा है।
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जनता का सवाल — कार्रवाई या सिर्फ वाहवाही?
लोग पूछ रहे हैं —
क्या पुलिस सिर्फ घटनाओं के बाद एक्टिव होगी?
क्या अपराधियों को पहले से चिन्हित कर कार्रवाई नहीं हो सकती?
क्या सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस और ट्वीट से कानून व्यवस्था सुधरेगी?
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निष्कर्ष
देहरादून में बढ़ते अपराध सिर्फ कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि भरोसे का संकट बनते जा रहे हैं। अगर जल्द कड़े और जमीनी स्तर पर कदम नहीं उठे, तो “सेफ सिटी” की पहचान पूरी तरह खत्म होने का खतरा है।



