
सरकारी दफ्तरों से लेकर ठेकेदारी तक, हर कोने में “कमीशन” शब्द गूंजता है। एक आम नागरिक को किसी भी सरकारी काम के लिए सीधे सेवा नहीं मिलती, बल्कि सबसे पहले सामने आता है एक “दलाल” या खुद अधिकारी जो सीधे तौर पर या परोक्ष रूप से कमीशन की मांग करता है।
लेकिन सवाल उठता है कि आखिर कमीशनखोरी की शुरुआत कब और कैसे हुई?
इतिहास की परतों में दबा ‘कमीशन’ का जन्म
कमीशनखोरी की शुरुआत कोई नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद देश में सरकारी तंत्र मजबूत तो हुआ, लेकिन उसी के साथ भ्रष्टाचार भी जड़ें जमाने लगा। 1950-60 के दशक में जब सरकारी ठेके और योजनाएं बढ़ीं, तब अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच ‘सौदेबाज़ी’ शुरू हुई। धीरे-धीरे यह प्रथा बन गई—कोई भी काम तब तक नहीं होगा, जब तक “ऊपर” का हिस्सा तय न हो जाए।
कमीशन का खेल: कैसे चलता है सिस्टम?
आज की तारीख में हर विभाग में कमीशन की अलग-अलग ‘रेट लिस्ट’ है—
- ठेकेदारी में: कुल बजट का 10-30% तक अधिकारी और नेताओं को कमीशन जाता है।
- सरकारी नौकरी में: नियुक्ति के नाम पर लाखों रुपए की डील होती है।
- राशन, आवास, शौचालय जैसी योजनाओं में: लाभार्थी से पहले पैसा लिया जाता है, तभी फॉर्म आगे बढ़ता है।
एक ठेकेदार (गोपनीय नाम) ने बताया, “अगर 10 लाख का टेंडर है, तो 2-3 लाख तो सिर्फ अधिकारियों की जेब में जाता है। नहीं दो तो फ़ाइल अटक जाती है।”
अधिकारी कैसे लेते हैं कमीशन?
- बिचौलियों के ज़रिए – सीधे पैसे नहीं लेते, बल्कि जान-पहचान के लोगों या ठेकेदारों से कैश में लेते हैं।
- फ़र्ज़ी बिलों के ज़रिए – काम अधूरा होता है, लेकिन भुगतान पूरा कराया जाता है, जिससे दोनों पक्षों को फायदा हो।
- उपहार या सेवा के रूप में – मंहगे मोबाइल, गाड़ियाँ, विदेश यात्रा तक इस ‘कमीशन कल्चर’ का हिस्सा हैं।
- चुपचाप खाते में ट्रांसफर – अब डिजिटल युग में नाम बदलकर फर्जी खातों में पैसा डलवाया जाता है।
क्या है समाधान?
सरकारी पारदर्शिता बढ़ाना, डिजिटलीकरण, RTI का सख्त पालन और आम जनता का जागरूक होना ही इसका इलाज है। लेकिन जब तक अंदर से सिस्टम सुधरेगा नहीं, तब तक ‘कमीशन’ रूपी दीमक देश को अंदर से खाता रहेगा।
अंत में सवाल यह है: क्या हम इतने मजबूर हो गए हैं कि बिना ‘कमीशन’ दिए कोई काम ही न हो?
अगर हम अब भी नहीं जागे, तो कल का भारत भी इसी भ्रष्ट व्यवस्था में जकड़ा रहेगा।



