
देहरादून
आईएसबीटी देहरादून में ट्रक की टक्कर से एक व्यक्ति की दर्दनाक मौत ने एक बार फिर राजधानी की यातायात व्यवस्था और सड़क सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वाहन संख्या UK07 CD 5732 (ट्रक) द्वारा कुचले गए व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि चालक वाहन छोड़कर फरार हो गया।

घटना के बाद आरटीओ देहरादून की सचल दल टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए वाहन को पकड़ लिया। मौके पर तैनात प्रवर्तन अधिकारी अनुराधा पंत, चालक सुशील कुमार, परिवहन आरक्षी रेखा और होमगार्ड रवि की तत्परता से यह स्पष्ट हुआ कि विभागीय स्तर पर प्रतिक्रिया तेज थी। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते—क्या यही कार्रवाई पर्याप्त है? इससे पूर्व भी आईएसबीटी पर हो चुके ऐसे कई हादसे जो चुकी कई मौतें।
गलती किसकी?
- तेज रफ्तार और लापरवाही: आईएसबीटी जैसे भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में भारी वाहन का प्रवेश और तेज गति किसके आदेश पर?
- ड्राइवर की जवाबदेही: हादसे के बाद फरार होना सीधे-सीधे अपराध है। ऐसे चालकों की पृष्ठभूमि जांच और प्रशिक्षण पर सवाल उठते हैं।
- प्रशासनिक चूक: क्या भारी वाहनों के लिए समय-सीमा, रूट और स्पीड कंट्रोल का सख्ती से पालन हो रहा है?

क्या कार्रवाई सिर्फ दिखावा है?
वाहन पकड़ना और चालान करना जरूरी है, लेकिन मौत के बाद चालान पीड़ित परिवार के लिए न्याय नहीं है। जब तक
- लाइसेंस सत्यापन,
- ड्राइवर की गिरफ्तारी,
- वाहन स्वामी की जवाबदेही,
- और आईएसबीटी में ट्रैफिक मैनेजमेंट की स्थायी व्यवस्था
सुनिश्चित नहीं होती, तब तक ऐसी कार्रवाइयाँ अधूरी ही मानी जाएंगी।
समाधान कौन निकालेगा?
समाधान कागज़ों में नहीं, मैदान में चाहिए:
- आईएसबीटी में भारी वाहनों पर सख्त समय-सीमा/प्रतिबंध
- सीसीटीवी और ऑटोमैटिक स्पीड एनफोर्समेंट
- फरार चालकों पर गैर-जमानती धाराओं में त्वरित गिरफ्तारी
- वाहन स्वामी की संयुक्त जिम्मेदारी तय
- ट्रैफिक पुलिस–आरटीओ–नगर निगम का संयुक्त एक्शन प्लान
असली सवाल
हर हादसे के बाद विभाग सक्रिय दिखता है, लेकिन हादसा होने से पहले की तैयारी कहां है?
क्या एक और मौत के बाद फिर वही बयान, वही चालान, वही फाइलें?
जब तक सिस्टम बदलेगा नहीं, तब तक आईएसबीटी जैसी जगहें दुर्घटनाओं का अड्डा बनी रहेंगी।
अब वक्त है कि कार्रवाई दिखावे से निकलकर समाधान तक पहुंचे—ताकि अगली खबर किसी और की मौत पर न लिखनी पड़े।



