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“प्रशासन सोया, शहर रोया – कुत्तों के कहर से कांप रहा देहरादून!”

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स्मार्ट सिटी का तमगा लगाए घूम रही देवभूमि की राजधानी इन दिनों आवारा कुत्तों के आतंक से कराह रही है। हर गली, हर मोहल्ले में इन बेकाबू कुत्तों का खौफ इस कदर है कि बच्चों का स्कूल जाना, बुज़ुर्गों की सुबह की सैर और महिलाओं का बाजार जाना भी अब खतरे से खाली नहीं रहा।

ताजा हालात

  • बीते एक महीने में 20 से ज्यादा लोगों पर कुत्तों ने हमला किया है।
  • सबसे चिंताजनक बात – कई मामलों में छोटे बच्चों को निशाना बनाया गया।
  • रेसकोर्स, नेहरू कॉलोनी, वसंत विहार जैसे पॉश इलाकों में भी हालत खराब।

प्रशासन की “व्यवस्था”

नगर निगम ने दावा किया है कि:

  • स्ट्रीट डॉग्स की नसबंदी की प्रक्रिया जारी है।
  • शेल्टर होम बनाए जा रहे हैं लेकिन उनमें जगह कम और कुत्ते ज्यादा हैं।
  • लोगों से अपील की जा रही है कि कुत्तों को न उकसाएं और शिकायत दर्ज करवाएं।

लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। लोगों का आरोप है कि नगर निगम की टीमें मौके पर नहीं पहुंचतीं, और पहुंचें भी तो कुत्तों को पकड़ने का कोई कारगर इंतजाम नहीं।

जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर

स्थानीय निवासी कह रहे हैं:

“प्रशासन सिर्फ कागज़ी कार्यवाही कर रहा है। जब तक कोई बड़ा हादसा न हो, कोई हरकत नहीं होती!”

“अगर यही हाल रहा तो हमें अपने बच्चों को घर में बंद रखना पड़ेगा।”

अब सवाल ये उठता है:

क्या नगर निगम सिर्फ रिपोर्ट बटोर रहा है?

क्या देहरादून की सड़कों पर इंसान से ज़्यादा अधिकार अब कुत्तों के हैं?

और क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन जागेगा?

देहरादून की सड़कों पर खौफ है, और जिम्मेदारी की गेंद एक बार फिर फाइलों में उलझी है।

Faizan Khan Faizy Editorial Advisor

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