देहरादून
देहरादून के दून अस्पताल के बाहर लगा नगर निगम का पार्किंग शुल्क बोर्ड कई सवाल खड़े कर रहा है। जहां एक ओर अस्पताल में पर्चा मात्र 20 रुपये में बनता है, वहीं अस्पताल आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को पार्किंग के नाम पर उससे ज्यादा रकम चुकानी पड़ रही है।
बोर्ड के अनुसार दोपहिया वाहनों के लिए निर्धारित दरें इस प्रकार हैं—
• प्रथम एक घंटे के लिए: ₹15 + 18% GST = ₹18
• एक से तीन घंटे तक: ₹30 + 18% GST = ₹36
• तीन घंटे से अधिक: ₹50 + 18% GST = ₹59
यानी अगर किसी मरीज की हालत गंभीर है और तीमारदार को तीन घंटे से ज्यादा अस्पताल में रुकना पड़ जाए, तो उसे 59 रुपये केवल पार्किंग के देने होंगे। सवाल यह है कि जब इलाज सरकारी है, पर्ची 20 रुपये की है, तो पार्किंग उससे लगभग तीन गुना महंगी क्यों?
मरीज पर दोहरी मार
अस्पताल कोई मॉल या सिनेमा हॉल नहीं होता, जहां लोग शौक से घंटों रुकते हों। यहां आने वाला हर व्यक्ति मजबूरी में आता है। कई बार मरीजों को घंटों जांच, दवा और भर्ती प्रक्रिया में लग जाते हैं। ऐसे में पार्किंग शुल्क गरीब और मध्यम वर्ग के लिए अतिरिक्त बोझ बनता जा रहा है।
क्या स्वास्थ्य सेवा कमाई का जरिया?
सरकारी अस्पतालों का उद्देश्य सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवा देना है। लेकिन अगर अस्पताल परिसर के बाहर पार्किंग शुल्क ही भारी पड़ने लगे, तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। क्या नगर निगम को अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थानों पर रियायती दरें लागू नहीं करनी चाहिए?
जिम्मेदार कौन?
स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पतालों के बाहर पार्किंग शुल्क मानवीय आधार पर तय होना चाहिए। खासकर इमरजेंसी और लंबे इलाज के मामलों में राहत मिलनी चाहिए।
“पैसे दो वरना हटाओ गाड़ी” — तीमारदारों का आरोप
स्थानीय लोगों का कहना है कि पार्किंग स्टाफ का व्यवहार कई बार अभद्र होता है। समय सीमा को लेकर बहस, अतिरिक्त शुल्क की मांग और बात-बात पर तीखी भाषा—इन सबने लोगों में आक्रोश पैदा कर दिया है।
कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर संवेदनशीलता की जगह सख्ती और वसूली का रवैया अपनाया जा रहा है।
नगर निगम पर उठे सवाल
लोग पूछ रहे हैं कि क्या नगर निगम सिर्फ टेंडर देकर जिम्मेदारी से मुक्त हो सकता है?
क्या अस्पताल परिसर के बाहर रियायती दरें तय नहीं की जानी चाहिए?
क्या पार्किंग स्टाफ के व्यवहार की मॉनिटरिंग नहीं होनी चाहिए?
अस्पताल कोई व्यावसायिक केंद्र नहीं है। यहां हर आने वाला व्यक्ति मजबूरी में आता है। ऐसे में पार्किंग को कमाई का जरिया बनाना नैतिक रूप से भी सवालों के घेरे में है।
अब देखना यह होगा कि नगर निगम और संबंधित प्रशासन इस मुद्दे पर कोई संवेदनशील फैसला लेते हैं या मरीज और उनके परिजन यूं ही जेब ढीली करते रहेंगे।


