
देहरादून
कानून कहता है कि किसी भी वाहन में निर्धारित सीमा से अधिक काली फिल्म (ब्लैक शीशा) लगाना प्रतिबंधित है। सख्त निर्देश हैं कि गाड़ी के शीशे 70% तक पारदर्शी होने चाहिए, ताकि सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनी रहे। सड़क पर आम जनता की गाड़ियों को रोककर पुलिस चालान करती है, वाहन सीज कर देती है, लेकिन सवाल यह है कि जब बात IAS, PCS और बड़े अफसरों की गाड़ियों की आती है तो कानून की किताबें क्यों बंद हो जाती हैं?
शहर की सड़कों पर रोज़ाना ऐसी सैकड़ों गाड़ियां दौड़ती हैं जिनके शीशे पूरी तरह काले होते हैं। आम जनता से कहा जाता है कि यह कानून सुरक्षा कारणों से बनाया गया है, लेकिन अफसरों के लिए यह कानून अचानक कैसे बदल जाता है?
क्या कानून सिर्फ गरीब और मध्यम वर्गीय वाहन चालकों पर लागू होता है? क्या पुलिस प्रशासन अफसरों के सामने बेबस है? या फिर ये दोहरी व्यवस्था साफ दिखा रही है कि “VIP कल्चर” अब भी कानून से ऊपर है।
नियम साफ कहते हैं कि बिना अनुमति किसी भी वाहन में काले शीशे या सनफिल्म का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है। बावजूद इसके अफसरों की गाड़ियां पुलिस के सामने से गुजरती हैं और कार्यवाही तो दूर, नजर भी फेर ली जाती है।
जनता अब सवाल कर रही है – “क्या वीआईपी दर्जा कानून से बड़ा है?”
अगर आम जनता पर कड़ा एक्शन लिया जा सकता है, तो अधिकारियों पर कार्रवाई करने में परहेज़ क्यों?



