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बर्फबारी गायब, बारिश नदारद: जलवायु संकट की गिरफ्त में उत्तराखंड, टूटे 40 साल के रिकॉर्ड, ज़रूर पढ़े ये खबर

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देहरादून

उत्तराखंड इस समय गंभीर जलवायु और पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है। सर्दियों का आधा सीजन बीत चुका है, लेकिन हालात यह हैं कि अब तक न पहाड़ों में बर्फ गिरी और न मैदानों में बारिश की एक बूंद। यह स्थिति न केवल असामान्य है, बल्कि पिछले 40 वर्षों के मौसम रिकॉर्ड को तोड़ने वाली मानी जा रही है।

इतिहास में पहली बार सूनी चोटियां

गढ़वाल और कुमाऊं के ऊंचाई वाले इलाकों—तंगनाथ, औली, चोपता और हेमकुंड साहिब क्षेत्र—जहां आमतौर पर जनवरी तक मोटी बर्फ की चादर बिछ जाती थी, वहां इस बार चोटियां पूरी तरह खाली हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार 1985 के बाद यह पहली बार है जब जनवरी में कई ऊंची हिमालयी चोटियों पर बर्फबारी नहीं हुई।

बारिश शून्य, सर्दी बेअसर

मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार दिसंबर और जनवरी में राज्य में वर्षा लगभग शून्य दर्ज की गई। सामान्य तौर पर इस अवधि में पश्चिमी विक्षोभों के कारण बारिश और बर्फबारी होती है, लेकिन इस बार वे या तो आए ही नहीं या बेहद कमजोर साबित हुए।

आखिर क्या है वजह?

विशेषज्ञ इस संकट के पीछे कई बड़े कारण बता रहे हैं—
• पश्चिमी विक्षोभ कमजोर: सर्दियों में उत्तराखंड को वर्षा और बर्फ देने वाले पश्चिमी विक्षोभों की संख्या और ताकत दोनों में कमी आई है।
• जलवायु परिवर्तन का असर: वैश्विक तापमान बढ़ने से हिमालय क्षेत्र में ठंड की तीव्रता घट रही है, जिससे बर्फ जमने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
• तापमान का असंतुलन: दिन में असामान्य गर्मी और रात में अचानक ठंड से मौसम का प्राकृतिक चक्र बिगड़ रहा है।
• मानव गतिविधियां: अंधाधुंध निर्माण, वनों की कटाई और पहाड़ों पर बढ़ता दबाव भी पर्यावरणीय संतुलन को नुकसान पहुंचा रहा है।

खेती, बागवानी और जलस्रोतों पर संकट

बर्फ और बारिश की कमी का सीधा असर कृषि और बागवानी पर पड़ रहा है। सेब, आड़ू और अन्य शीतोष्ण फसलों को जरूरी “चिलिंग पीरियड” नहीं मिल पा रहा, जिससे पैदावार घटने की आशंका है।
वहीं, ग्लेशियरों और प्राकृतिक जलस्रोतों को पोषण न मिलने से आने वाले महीनों में पेयजल संकट गहराने के संकेत हैं।

जंगलों में आग का बढ़ता खतरा

सूखे हालातों के कारण जंगलों की जमीन और घास पूरी तरह सूख चुकी है। इससे वनाग्नि का खतरा कई गुना बढ़ गया है, जिसकी झलक हाल के दिनों में कई इलाकों में देखने को मिल चुकी है।

पर्यटन पर भी भारी असर

औली, मसूरी, नैनीताल जैसे पर्यटन स्थलों पर बर्फ न पड़ने से पर्यटन कारोबार को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। बर्फ देखने आने वाले सैलानी निराश लौट रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों की आजीविका पर असर पड़ा है।

चेतावनी साफ

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति केवल एक खराब मौसम नहीं, बल्कि आने वाले बड़े संकट की चेतावनी है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो उत्तराखंड को जल, जंगल और जमीन—तीनों मोर्चों पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

संक्षेप में, बर्फ और बारिश का यह सूखा सिर्फ मौसम की गड़बड़ी नहीं, बल्कि हिमालयी राज्य उत्तराखंड के भविष्य पर मंडराता खतरा है—जिसे अब नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।

Faizan Khan Faizy Editorial Advisor

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