
एफ़आईआर (FIR) क्या है?
एफआईआर यानी First Information Report किसी भी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की पुलिस में दी गई पहली लिखित सूचना है। यह पुलिस द्वारा अपराध की जाँच शुरू करने का आधार होती है।
🔹 कौन से अपराध में FIR दर्ज होती है?
- संज्ञेय अपराध (Cognizable Offences) – जैसे हत्या, चोरी, डकैती, दहेज उत्पीड़न, बलात्कार, धोखाधड़ी आदि।
👉 इन अपराधों में पुलिस को बिना कोर्ट की अनुमति और बिना वारंट के ही तुरंत मामला दर्ज करना और जांच शुरू करना अनिवार्य है। - असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable Offences) – जैसे गाली देना, हल्की मारपीट, धमकी देना इत्यादि।
👉 इनमें पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, बल्कि शिकायत दर्ज कर कोर्ट के आदेश पर ही कार्रवाई करती है।
🔹 FIR दर्ज करने का नियम (CrPC की धारा 154 के अनुसार)
- एफआईआर लिखना अनिवार्य – जब कोई व्यक्ति पुलिस स्टेशन जाकर संज्ञेय अपराध की सूचना देता है तो पुलिस को FIR दर्ज करना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
- भाषा का नियम – FIR उस भाषा में लिखी जाएगी, जिसे शिकायतकर्ता समझता है। यदि शिकायतकर्ता पढ़ा-लिखा नहीं है तो पुलिस FIR को ज़ोर से पढ़कर सुनाएगी।
- हस्ताक्षर – शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर या अंगूठे का निशान लेना ज़रूरी है।
- कॉपी देना अनिवार्य – शिकायतकर्ता को FIR की एक सर्टिफाइड कॉपी बिना किसी शुल्क के दी जाएगी।
- मौखिक सूचना भी मान्य – अगर शिकायत मौखिक दी जाती है तो पुलिस को उसे लिखित रूप में दर्ज करना होगा।
- महिला संबंधित अपराध – यदि महिला से जुड़े अपराध (जैसे छेड़छाड़, बलात्कार आदि) हों तो FIR महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज की जाएगी और पीड़िता से सम्मानजनक माहौल में बयान लिया जाएगा।
🔹 अगर पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें?
- उच्च अधिकारी से संपर्क – SP या DIG को लिखित शिकायत दें।
- मजिस्ट्रेट के पास जाएं – दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट से FIR दर्ज करने का आदेश दिलवाया जा सकता है।
- ऑनलाइन FIR – कई राज्यों में ऑनलाइन FIR दर्ज करने की सुविधा भी है।
🔹 FIR में क्या-क्या लिखा जाता है?
- अपराध का विवरण (कब, कहाँ और कैसे हुआ)
- अपराध करने वाले व्यक्ति का नाम (अगर ज्ञात हो)
- गवाहों के नाम और विवरण (अगर हों)
- पीड़ित और शिकायतकर्ता की जानकारी
👉 कुल मिलाकर FIR दर्ज करना पुलिस की जिम्मेदारी और शिकायतकर्ता का अधिकार है।



