
दून मेडिकल कॉलेज में इस्तीफों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। पहले मुख्य वार्डन पद से डॉ. विवेकानंद सत्यवली ने इस्तीफा दिया, उसके बाद एंटी रैगिंग कमेटी के अध्यक्ष और बाल रोग विभाग के एचओडी डॉ. अशोक कुमार ने भी अपना पद छोड़ दिया। इससे पहले डिप्टी एमएस डॉ. एन.एस. बिष्ट भी जिम्मेदारी से इस्तीफा दे चुके हैं। लगातार हो रहे इन इस्तीफों ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा सामने आ रही है कि अस्पताल की प्राचार्य डॉ. गीता जैन की कार्यशैली और डॉक्टरों के प्रति अलग-अलग व्यवहार को लेकर लंबे समय से असंतोष का माहौल बना हुआ है। कई डॉक्टरों और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच यह भावना बताई जा रही है कि प्रशासनिक फैसलों और कार्यसंस्कृति के कारण कामकाज प्रभावित हो रहा है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
बताया जा रहा है कि पिछले कुछ समय में कई डॉक्टर और अधिकारी या तो अपने पदों से हटे हैं या फिर संस्थान छोड़ चुके हैं। यदि एक के बाद एक जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग इस्तीफा दे रहे हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि संस्थान के भीतर गहराते असंतोष का संकेत भी हो सकता है।
स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल कॉलेज जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में लगातार इस्तीफे होना बेहद चिंताजनक है। इससे न केवल प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ सकता है।
अब सवाल यह है कि आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां हैं जिनके चलते वरिष्ठ डॉक्टर और अधिकारी जिम्मेदारियां छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं? क्या सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच करेगा? क्या डॉक्टरों और कर्मचारियों की शिकायतों को सुना जाएगा?
जनहित से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर उत्तराखंड सरकार और स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल को संज्ञान लेते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। यदि वास्तव में कार्यशैली और प्रशासनिक माहौल को लेकर समस्याएं हैं तो उनका समाधान निकालना जरूरी है। साथ ही ऐसे प्राचार्यों और प्रशासकों की नियुक्ति पर भी विचार होना चाहिए जो बेहतर समन्वय, सकारात्मक कार्यसंस्कृति और टीम भावना के साथ संस्थान को आगे बढ़ा सकें।
मेडिकल कॉलेज में लगातार हो रहे इस्तीफे अब केवल प्रशासनिक घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि यह प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी बनते जा रहे हैं। सरकार को समय रहते स्थिति स्पष्ट करनी होगी, अन्यथा आने वाले समय में इसका असर चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं दोनों पर पड़ सकता है।



