
देहरादून। कभी देहरादून का नाम लिया जाता था तो जेहन में एक शांत, खूबसूरत और अपेक्षाकृत सुरक्षित शहर की तस्वीर उभरती थी। ऐसा शहर, जहां परिवार रात में भी बेफिक्र होकर निकल सकते थे, बुजुर्ग मोहल्लों में टहल सकते थे और महिलाएं खुद को दूसरे बड़े शहरों की तुलना में अधिक सुरक्षित महसूस करती थीं। यही वजह थी कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून को लंबे समय तक एक ‘सेफ सिटी’ की पहचान से देखा जाता रहा।
लेकिन क्या आज भी तस्वीर वैसी ही है?
शहर के बदलते माहौल और लगातार सामने आ रही आपराधिक घटनाओं ने इस सवाल को गंभीर बना दिया है। पिछले कुछ वर्षों में देहरादून तेजी से फैलता गया, आबादी बढ़ी, बाहरी क्षेत्रों का शहरीकरण हुआ, नए बाजार और कॉलोनियां बनीं और राजधानी महानगर का रूप लेने लगी। लेकिन इसी बदलाव के बीच अपराध का स्वरूप भी बदला है।
आज आए दिन लड़ाई-झगड़े, मारपीट, हत्या, चोरी, चेन स्नैचिंग, मोबाइल लूट और नशे से जुड़े अपराध सुर्खियों में दिखाई देते हैं। अगस्त 2026 में पुलिस के सामने नशे के आदी युवाओं के कथित तौर पर चेन स्नैचिंग, चोरी और मोबाइल चोरी जैसी वारदातों की चुनौती भी सामने आई है।
क्या बदल गया देहरादून?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर वह कौन-सा बदलाव है जिसने देहरादून की पहचान को प्रभावित किया?
शहर का तेजी से विस्तार, बढ़ती आबादी, बाहरी क्षेत्रों से लगातार बढ़ता आवागमन, नशे का फैलता नेटवर्क, बेरोजगारी और युवाओं में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति—इन सभी पहलुओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ देखने की जरूरत है।
नशा और स्ट्रीट क्राइम का कनेक्शन भी चिंता का विषय बनता जा रहा है। पुलिस के सामने ऐसी घटनाएं आ रही हैं जिनमें नशे की लत पूरी करने के लिए चोरी और स्नैचिंग जैसे अपराध किए जाने की बात सामने आई है। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य से जुड़ा गंभीर सामाजिक संकट भी है।
जब बुजुर्ग घर से निकलने में डरें तो सवाल बड़ा है
किसी भी शहर की सुरक्षा का असली पैमाना सिर्फ एफआईआर की संख्या नहीं होती। असली पैमाना यह है कि वहां रहने वाला आम नागरिक खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है।
हाल ही में देहरादून के बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर सामने आई चिंताओं में चेन स्नैचिंग, निगरानी की कमी और आवासीय इलाकों में अजनबियों की आवाजाही जैसे मुद्दे सामने आए। कुछ बुजुर्गों ने अकेले बाहर निकलने से बचने की बात तक कही।
वहीं वसंत विहार में दिनदहाड़े बुजुर्ग महिला से सोने की चेन लूटे जाने की घटना ने भी शहर की सड़क सुरक्षा पर सवाल खड़े किए। घटना CCTV में कैद हुई, लेकिन सवाल वही है—अगर दिन के उजाले में भी नागरिक सुरक्षित नहीं हैं तो रात की सुरक्षा का भरोसा कैसे बनेगा?
अपराध की खबरें बढ़ीं या डर बढ़ा?
यहां एक जरूरी बात समझना भी बेहद महत्वपूर्ण है। किसी शहर को सीधे ‘क्राइम सिटी’ घोषित कर देना आंकड़ों के लिहाज से उचित नहीं होगा। अपराध की घटनाओं के साथ-साथ शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति, पुलिस की सक्रियता और जनसंख्या वृद्धि जैसे कई कारक अपराध के आंकड़ों को प्रभावित करते हैं।
उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड में 2024 में हत्या के 218 मामले दर्ज हुए, जबकि 2023 में यह संख्या 189 थी। चोरी के मामले 2023 के 2,473 से घटकर 2024 में 2,441 हुए। यानी हर अपराध श्रेणी में लगातार बढ़ोतरी नहीं हुई है।
लेकिन दूसरी तरफ जनता के मन में पैदा हो रहा डर भी किसी आंकड़े से कम महत्वपूर्ण नहीं है।
राजधानी का सवाल सिर्फ पुलिस का नहीं
देहरादून में कानून-व्यवस्था बेहतर रखने की जिम्मेदारी निश्चित रूप से पुलिस और प्रशासन की है, लेकिन समस्या का समाधान केवल पुलिसिंग बढ़ाने से नहीं होगा।
नशे पर प्रभावी प्रहार, ड्रग सप्लाई नेटवर्क पर कार्रवाई, संदिग्ध गतिविधियों वाले इलाकों में लगातार निगरानी, CCTV की प्रभावी मॉनिटरिंग, रात की पुलिस पेट्रोलिंग, स्ट्रीट लाइटिंग, संवेदनशील इलाकों की पहचान और अपराधियों में कानून का भय—इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।
साथ ही बार-बार अपराध करने वाले आरोपियों की निगरानी और जमानत के बाद उनके व्यवहार पर नजर रखने की व्यवस्था को भी मजबूत करने की जरूरत है। हालिया पुलिस चर्चाओं में repeat offenders की समस्या भी सामने आई है।
पुलिस की कार्रवाई भी हुई, लेकिन भरोसा और मजबूत करना होगा
यह भी तस्वीर का दूसरा पक्ष है कि पुलिस और सरकार की ओर से कानून-व्यवस्था को लेकर कार्रवाई की गई है। फरवरी 2026 में देहरादून में लगातार दो महिला हत्याओं के बाद DGP दीपम सेठ ने उच्चस्तरीय बैठक की और लापरवाही के आरोप में पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई भी की।
यानी सवाल यह नहीं कि पुलिस कुछ कर रही है या नहीं। सवाल यह है कि क्या कार्रवाई इतनी प्रभावी और लगातार है कि आम आदमी के मन में सुरक्षा का भरोसा वापस लौट सके?
देहरादून को फिर चाहिए ‘सेफ सिटी’ का भरोसा
देहरादून का विकास रुकना नहीं चाहिए। राजधानी का विस्तार होना भी जरूरी है। नए लोग आएं, नए कारोबार हों, शहर आधुनिक बने—यह विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
लेकिन विकास के साथ सुरक्षा की कीमत नहीं चुकाई जा सकती।
सवाल यह नहीं कि देहरादून बदल रहा है। सवाल यह है कि देहरादून किस दिशा में बदल रहा है?
जिस शहर की पहचान कभी शांति, सुकून और सुरक्षित माहौल से होती थी, वहां अगर मां-बाप अपने बच्चों को लेकर चिंतित हों, बुजुर्ग अकेले निकलने से डरें और आम नागरिक सड़क पर होने वाली छोटी-सी कहासुनी को लेकर भी आशंकित रहने लगे, तो यह प्रशासन, पुलिस और पूरे समाज के लिए गंभीर चेतावनी है।
देहरादून को ‘क्राइम सिटी’ बनने से रोकना सिर्फ पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। यह पुलिस, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और आम जनता—सभी की साझा जिम्मेदारी है।
क्योंकि राजधानी की असली पहचान उसकी ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और बढ़ते बाजार नहीं होते।
राजधानी की असली पहचान यह होती है कि वहां रहने वाला आम आदमी रात को घर लौटते वक्त खुद को कितना सुरक्षित महसूस करता है।
और आज देहरादून के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—
“क्या राजधानी देहरादून अपनी पुरानी ‘सेफ सिटी’ वाली पहचान वापस हासिल कर पाएगी, या बढ़ते अपराधों का साया इसकी नई पहचान बन जाएगा?”



