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सेवा को संकल्प बनाकर निभाने वाले अधिकारी: सेवानिवृत्त मनमोहन सिंह बिष्ट बने पर्यावरण संरक्षण की मिसाल

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उत्तराखंड। सेवानिवृत्त वन अधिकारी मनमोहन सिंह बिष्ट उन चुनिंदा अधिकारियों में रहे, जिन्होंने अपनी ड्यूटी को केवल नौकरी नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम समझकर निभाया। उन्होंने वह कर दिखाया, जो अक्सर केवल आदेशों के दायरे में सीमित रहने वाला अधिकारी नहीं कर पाता। बिना किसी सरकारी या बाहरी वित्तीय सहायता के, क्षेत्र के लोगों को साथ लेकर उन्होंने जंगल और जल संरक्षण के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किए।

मनमोहन सिंह बिष्ट ने अपने कार्यक्षेत्र को परिवार की तरह अपनाया। अधिक से अधिक समय क्षेत्र में बिताकर उन्होंने ग्रामीणों, युवाओं और बच्चों को जागरूक किया, लोगों को संगठित किया और पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दिया। यही कारण है कि आज भी क्षेत्र के लोग उनके कार्यों की सराहना करते नहीं थकते।

जनसहयोग से हुआ बड़ा बदलाव

पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन की दिशा में यह पहल एक उदाहरण बनकर सामने आई है। स्थानीय ग्रामीणों, स्कूली छात्र-छात्राओं, गैर सरकारी संस्थाओं, विभागीय कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों के सामूहिक प्रयास से जोनपुर रेंज एवं नरेंद्रनगर वन प्रभाग के विभिन्न क्षेत्रों में बिना किसी बाहरी सहायता के कई महत्वपूर्ण कार्य संपन्न हुए।

इस अभियान के अंतर्गत वन्यजीवों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था, जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल स्तर बढ़ाने के लिए अनेक स्थानों पर ठोस कार्य किए गए। प्रदेश में पहली बार अभिनव प्रयोग के रूप में बुरांश वन रोपण किया गया। साथ ही बुरांश और साल की पौधशालाएं विकसित कर पौध तैयार की गईं, जिसे वन विभाग के लिए एक मॉडल कार्य माना जा रहा है।

365 हेक्टेयर वन क्षेत्र का पुनर्जीवन

अवेल गांव और आसपास के करीब 365 हेक्टेयर क्षेत्र में अवैध कटान, अवैध लॉगिंग और ईंधन की अनियंत्रित आपूर्ति के कारण वन क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो चुका था। सामूहिक प्रयासों से इस क्षेत्र को दोबारा जीवन दिया गया और एक सफल कार्य मॉडल प्रस्तुत किया गया।
लंबे समय से चीड़ बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण जंगलों में आग से भारी नुकसान हो रहा था। इसे रोकने के लिए भी प्रभावी कदम उठाए गए।

चीड़ पिरूल से रोजगार और संरक्षण

परियोजना के तहत चीड़ पिरूल से खाद निर्माण, पाइन पिट बनाना और पहली बार चीड़ पिरूल पर मशरूम उत्पादन का प्रयोग किया गया। इसके अलावा चीड़ पिरूल से नेट वायर क्रेट चेकडैम बनाकर भूमि और जल संरक्षण को मजबूती दी गई, जिसे वन विभाग की विभिन्न योजनाओं में उपयोगी पाया गया।

स्वच्छता और हरियाली का संदेश

स्वच्छता अभियान के तहत मुनीकीरेती से पचक तक लगभग 65 किलोमीटर मोटर मार्ग के दोनों ओर 45 दिनों तक विशेष अभियान चलाया गया। इस दौरान करीब 28.8 कुंतल प्लास्टिक कचरा एकत्र कर निस्तारित किया गया। अभियान में ग्रामीणों, छात्रों और स्वयंसेवी संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी रही।

इसके साथ ही सड़क किनारे क्षतिग्रस्त वृक्षों, झाड़ियों और औषधीय पौधों की 45 हजार से अधिक प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन किया गया।
“एक प्रकृति संरक्षण एवं संवर्धन का 45 दिवसीय मेगा कार्यक्रम” जनसहयोग से सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

किसानों की आय बढ़ाने की पहल

ग्रामीणों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से फेवड़ापानी और अन्य क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता वाले अखरोट पौधों का प्रशिक्षण और उत्पादन कर उन्हें कम कीमत पर किसानों को उपलब्ध कराया गया। आमतौर पर ये पौधे शिमला और कश्मीर से महंगे दामों पर मंगाए जाते हैं।

सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी सेवा

सेवानिवृत्ति के बाद भी मनमोहन सिंह बिष्ट का प्रकृति के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। आज भी वे पर्यावरण, जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए सक्रिय हैं। इसके तहत 365 जागरूकता कार्यक्रम, Know Your Nature (Local Seed Collection) और सीड बॉल कार्यक्रम जैसे अभियानों का संचालन किया जा रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत और सकारात्मक संदेश है। रोहन त्यागी UP/UK ‘ब्यूरो हेड’

Faizan Khan Faizy Editorial Advisor

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