
देहरादून। राजधानी देहरादून में विकास कार्यों की रफ्तार भले ही कागजों में तेज दिखाई जा रही हो, लेकिन धरातल पर हालात इसके बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं। शहर के अलग-अलग इलाकों और प्रमुख चौराहों पर विभिन्न विभागों द्वारा कराए जा रहे निर्माण कार्य आम लोगों के लिए राहत नहीं, बल्कि मुसीबत बनते जा रहे हैं।

कहीं सड़क खोदकर महीनों से छोड़ दी गई है, कहीं गहरे गड्ढे खुले पड़े हैं, तो कहीं निर्माण कार्य पूरा होने के बावजूद मलबा और निर्माण सामग्री सड़क किनारे ही छोड़ दी गई है। बरसात के मौसम में इन गड्ढों और मलबे के कारण सड़कें और भी खतरनाक हो गई हैं। पानी भर जाने से गड्ढे दिखाई नहीं देते, जिससे दोपहिया और चारपहिया वाहन चालकों को हर पल दुर्घटना का खतरा बना रहता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार संबंधित विभागों को शिकायत करने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं होती। जिम्मेदार अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ लेते हैं, जबकि रोजाना हजारों लोग इन्हीं सड़कों से गुजरने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि विकास कार्यों के बाद सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जाएगा, समय पर सड़कें दुरुस्त नहीं होंगी और मलबा नहीं हटाया जाएगा, तो ऐसे विकास कार्य आखिर किसके लिए हैं? जनता की सुविधा के लिए या फिर उन्हें खतरे में डालने के लिए?
बरसात के इस मौसम में प्रशासन और संबंधित विभागों को तत्काल ऐसे सभी अधूरे कार्यों की समीक्षा कर सड़कें दुरुस्त कराने, गड्ढे भरने और मलबा हटाने की जरूरत है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो किसी बड़े हादसे के बाद जिम्मेदारी तय करना भी मुश्किल होगा। फिलहाल राजधानी की जनता यही पूछ रही है—“आखिर कब जागेंगे जिम्मेदार?”



