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देहरादून की हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री पर बढ़ता दबाव: कारोबार ठप, कर्मचारियों में नाराज़गी

Uttarakhand Shops and Establishments Act, 2017 के तहत बार टाइमिंग खत्म होने के बाद भी भोजन सेवा जारी रखी जा सकती है।

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देहरादून की पहचान सिर्फ उसकी खूबसूरती और शांत वातावरण से ही नहीं, बल्कि यहां के सुसंस्कृत खानपान और पारिवारिक माहौल वाले रेस्टोरेंट्स से भी है। खासकर राजपुर रोड जैसे इलाकों में स्थित चर्चित प्रतिष्ठान वर्षों से परिवारों और पर्यटकों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद स्थान रहे हैं।

हाल के दिनों में कुछ घटनाओं के चलते इन रेस्टोरेंट्स की छवि को क्लब या बार के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई, जिसके चलते पुलिस प्रशासन द्वारा सख्ती भी देखने को मिली। लेकिन इस पूरी तस्वीर का एक सकारात्मक और संतुलित पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सिर्फ खानपान नहीं—अर्थव्यवस्था की मजबूत कड़ी

रेस्टोरेंट, बार और पब इंडस्ट्री केवल खाने-पीने या नाइटलाइफ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजगार, GST और राज्य की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देती है।

* इस इंडस्ट्री पर हजारों लोगों की रोज़ी-रोटी निर्भर है, जिनमें अधिकांश उत्तराखंड के स्थानीय युवा शामिल हैं।
* एक रेस्टोरेंट औसतन 60 से 100 लोगों को रोजगार देता है।
* व्यवसायी लगातार GST और अन्य टैक्स के माध्यम से राज्य के राजस्व को मजबूत कर रहे हैं।

बढ़ता खर्च, घटती संभावनाएं

पहले से ही इस सेक्टर पर भारी आर्थिक दबाव है—

* ऊंचा किराया
* स्टाफ सैलरी
* ऑपरेशनल लागत
* बड़े ब्रांड्स की रॉयल्टी

देशभर के बड़े ब्रांड्स के आने से प्रतिस्पर्धा और लागत दोनों बढ़े हैं, जिससे छोटे और मध्यम स्तर के व्यवसायों के लिए टिके रहना मुश्किल होता जा रहा है।

प्रतिबंधों से बढ़ी परेशानी

पिछले एक महीने से हालात और चुनौतीपूर्ण हो गए हैं—

* इंडस्ट्री को “सॉफ्ट टारगेट” बनाकर सबसे पहले बंद कराया जाता है।
* आबकारी विभाग के नियमों के अनुसार बार सर्विंग का समय रात 12 बजे तक निर्धारित है।
* वहीं रेस्टोरेंट संचालन और भोजन सेवा पर अलग से कोई तय समय सीमा नहीं है।
* Uttarakhand Shops and Establishments Act, 2017 के तहत बार टाइमिंग खत्म होने के बाद भी भोजन सेवा जारी रखी जा सकती है।
* लेकिन वर्तमान में कई स्थानों पर रात 10:45 बजे तक ही ग्राहकों को बाहर कराया जा रहा है, जिसे व्यवसायी नियमों के विपरीत बता रहे हैं।

कानूनी पहलू—स्पष्ट लेकिन नजरअंदाज

व्यवसायियों का कहना है कि कानून स्पष्ट रूप से भोजन सेवा की अनुमति देता है, बशर्ते स्टाफ शिफ्ट और संचालन का उचित प्रबंधन किया जाए।

ऐसे में सवाल उठता है—जब कानून अनुमति देता है, तो रात 11 बजे के बाद खाने की सेवा पर रोक क्यों?

अगर कोई व्यक्ति शराब पीकर वाहन चलाता है, तो कार्रवाई उस व्यक्ति पर होनी चाहिए, न कि पूरे उद्योग को दंडित किया जाना चाहिए।

फैमिली कल्चर और जिम्मेदारी

राजपुर रोड और अन्य क्षेत्रों के अधिकांश प्रतिष्ठान फैमिली डाइनिंग पर केंद्रित हैं। यहां का माहौल शांत, अनुशासित और सामाजिक मर्यादाओं के अनुरूप होता है।

व्यवसायियों का कहना है कि ये प्रतिष्ठान मुख्य रूप से रेस्टोरेंट के तौर पर ही संचालित होते हैं। केवल शनिवार और रविवार को कुछ स्थानों पर सीमित स्तर पर क्लब या पार्टी नाइट्स आयोजित की जाती हैं, जबकि सप्ताह के बाकी दिनों में सामान्य फैमिली रेस्टोरेंट संचालन ही होता है।

कई रेस्टोरेंट्स ने सुरक्षा और निगरानी के अतिरिक्त इंतजाम भी किए हैं, ताकि किसी भी प्रकार की अव्यवस्था न हो।

प्रतिबंधों का सीधा असर

इन सख्तियों के चलते—

* व्यवसाय की व्यवहार्यता कम हो रही है
* रोजगार पर सीधा असर पड़ रहा है
* पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है
* बाहर से आने वाले पर्यटकों में शहर को लेकर नकारात्मक संदेश जा रहा है

संतुलन की जरूरत

पुलिस प्रशासन की कार्रवाई कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी है, लेकिन ईमानदारी से काम कर रहे प्रतिष्ठानों को भी समान रूप से समर्थन मिलना चाहिए।

अगर संतुलन बनाया गया, तो न केवल व्यवसाय सुरक्षित रहेगा बल्कि देहरादून की सकारात्मक छवि, पर्यटन और अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।

वहीं कई रेस्टोरेंट्स में काम कर रहे कर्मचारियों ने भी मौजूदा हालात को लेकर चिंता जताई है। स्टाफ का कहना है कि पिछले कुछ समय से बढ़ी सख्ती और कारोबार प्रभावित होने के कारण कामकाज काफी कम हो गया है। इसका असर सीधे कर्मचारियों की आय और रोज़मर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है।

कर्मचारियों के अनुसार, कई प्रतिष्ठानों में मालिक समय पर सैलरी देने में भी दिक्कत महसूस कर रहे हैं, जिससे स्टाफ को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कर्मचारियों ने कहा कि यदि यही स्थिति लगातार बनी रही तो उन्हें अपनी मांगों को लेकर धरना-प्रदर्शन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

स्टाफ का कहना है कि इस इंडस्ट्री से जुड़े हजारों परिवारों की आजीविका इसी रोजगार पर निर्भर है, इसलिए प्रशासन और संबंधित विभागों को ऐसा संतुलित समाधान निकालना चाहिए जिससे कानून व्यवस्था भी बनी रहे और रोजगार भी प्रभावित न हो।

 

व्यवसायियों और कर्मचारियों के बीच एक बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि राजधानी में सख्ती केवल रेस्टोरेंट्स और हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री पर ही क्यों दिखाई दे रही है।
जहां एक ओर लाइसेंस, टैक्स और सभी नियमों का पालन करते हुए संचालित हो रहे रेस्टोरेंट्स पर लगातार कार्रवाई की जा रही है, वहीं दूसरी ओर देर रात तक चलने वाली शादियों, रिसोर्ट पार्टियों और निजी हाउस पार्टियों पर उसी स्तर की सख्ती नजर नहीं आती।

कानूनी तरीके से व्यवसाय कर रहे हैं, नियमित रूप से टैक्स और लाइसेंस शुल्क जमा कर रहे हैं, सुरक्षा इंतजाम भी बनाए हुए हैं और प्रशासन के नियमों का पालन करते हैं। इसके बावजूद सबसे पहले कार्रवाई और बंदी का असर इसी सेक्टर पर पड़ता है।

सवाल ये उठता है कि केवल संगठित और रजिस्टर्ड व्यवसायों को निशाना बनाने से हजारों लोगों के रोजगार और पूरे हॉस्पिटैलिटी सेक्टर पर नकारात्मक असर पड़ रहा है।

 

Faizan Khan Faizy Editorial Advisor

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