
देहरादून। राजधानी के दून अस्पताल में कुछ डॉक्टरों की लंबे समय से एक ही जगह तैनाती को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं कि डॉक्टर वर्षों से एक ही संस्थान में क्यों टिके हुए हैं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रांसफर व्यवस्था सभी के लिए समान है या फिर कुछ डॉक्टरों के लिए नियम अलग हैं?
उत्तराखंड में हर साल स्थानांतरण प्रक्रिया के तहत पात्रता सूची और ट्रांसफर की कार्रवाई होती है। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 2026-27 के लिए फैकल्टी की ट्रांसफर पात्रता सूची जारी करने के बाद मेडिकल कॉलेजों के फैकल्टी के तबादले भी किए हैं।
इसके बावजूद दून अस्पताल में वर्षों से एक ही जगह टिके कुछ डॉक्टरों को लेकर चर्चा तेज है। आखिर लंबे समय से एक ही जगह तैनाती का आधार क्या है? क्या विभागीय जरूरत, विशेषज्ञता और प्रशासनिक कारणों से उन्हें रोका गया है या फिर ट्रांसफर से बचने के लिए किसी स्तर पर सिफारिश काम करती है?
सबसे बड़ा सवाल तो यह भी है कि क्या किसी डॉक्टर के पास इतना प्रभाव है कि उसका ट्रांसफर आदेश होने के बाद भी वह अपनी तैनाती यथावत रखवा सके?
हालांकि बिना ठोस प्रमाण के यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी डॉक्टर ने पैसा देकर ट्रांसफर रुकवाया है। लेकिन यदि ऐसी चर्चाएं हैं तो विभाग को स्वयं रिकॉर्ड सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
क्योंकि दून अस्पताल केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि मेडिकल शिक्षा और प्रशिक्षण का भी बड़ा केंद्र है। वरिष्ठ डॉक्टरों का अनुभव जरूरी है, लेकिन नई प्रतिभाओं और जूनियर डॉक्टरों को भी सीखने, काम करने और आगे बढ़ने का समान अवसर मिलना चाहिए।
अगर एक ही जगह वर्षों तक वही चेहरे बने रहेंगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि ट्रांसफर नीति आखिर किसके लिए है?
अब विभाग से सीधे सवाल—
* दून अस्पताल में कौन-कौन से डॉक्टर लंबे समय से एक ही पद/स्थान पर तैनात हैं?
* उनकी वर्तमान तैनाती की अवधि कितनी है?
* कितने डॉक्टर ट्रांसफर के लिए पात्र थे और कितनों का ट्रांसफर हुआ?
* किन डॉक्टरों को नियमों के तहत छूट मिली और उसका आधार क्या था?
* क्या किसी डॉक्टर ने व्यक्तिगत अनुरोध या विशेष प्रशासनिक कारण से ट्रांसफर रुकवाया?
* और सबसे अहम—क्या सभी डॉक्टरों पर ट्रांसफर नियम समान रूप से लागू हो रहे हैं?
दून अस्पताल में वर्षों से जमे डॉक्टरों का पूरा तैनाती रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिया जाए तो शायद इन सवालों के जवाब खुद-ब-खुद सामने आ जाएंगे।
क्योंकि सवाल डॉक्टरों की काबिलियत पर नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता पर है।



