
शासन-प्रशासन के सक्रियता के दावे और जनता की उम्मीदों के बीच फासला तब बढ़ता है जब विभागीय अधिकारियों के मोबाइल घंटियाँ अनसुनी रह जाती हैं। उत्तराखंड के कई विभागों में अधिकारी फोन न उठाने की घटनाएं बढ़ने लगी हैं — और नागरिकों, शिकायतकर्ताओं और पुलिस/आकस्मिक सेवाओं के लिये यह एक गंभीर समस्या बन चुकी है। अब वक्त आ गया है कि सरकार इस ‘अनुशासनहीनता’ पर सख्त नियम बनाकर लागू करे।
मुख्य बिंदु:
- अधिकारियों का समय पर फोन न उठाना नागरिकों की सुविधा और आपातकालीन प्रतिक्रियाशीलता को प्रभावित कर रहा है।
- इससे नीतिगत निर्णयों की तेज़ी व छोटे स्तर पर समस्याओं के समाधान में देरी होती है।
- त्वरित संचार व्यवस्था के लिए स्पष्ट दंडनीय निर्देश और मॉनीटरिंग तंत्र आवश्यक है।
घटना का असर:
किसी शिकायत, दुर्घटना या जरूरी सूचना के मामले में विभागीय समन्वय और निर्णय लेने में देरी सीधे तौर पर जनता को भुगतना पड़ता है। स्वास्थ्य, बिजली, आपदा प्रबंधन और पुलिस से जुड़े मामलों में समय पर संपर्क न होने पर नुकसान का जोखिम बढ़ जाता है। इससे राज्य प्रशासन की जवाबदेही पर भी प्रश्न उठते हैं।
सरकार को क्या करना चाहिए — प्रस्तावित सख्त कदम:
- ऑन-कॉल रोटेशन व अनिवार्य उपलब्धता: हर विभाग में वरिष्ठ और मध्य स्तर के अधिकारियों के लिए ऑन-कॉल शेड्यूल लागू हो — छुट्टियों/अवकाश के दौरान भी वैकल्पिक प्रतिनिधि उपलब्ध हो।
- ज्वाइंट इमरजेंसी कंसोल: प्रमुख शहरों में विभागीय ईमर्जेंसी हॉटलाइन (24×7) और बैकअप नंबर/ईमेल अनिवार्य करें।
- रिस्पॉन्स टाइम फ्रेम: औपचारिक निर्देश—कार्य दिनों में कॉल का उत्तर 15 मिनट के अंदर, ईमेल का जवाब 4 घंटे के अंदर। नियम तोड़े जाने पर समुचित अनुशासनात्मक कार्रवाई।
- लॉग और मॉनिटरिंग: हर विभागीय कॉल/शिकायत का डिजिटल लॉग रखना अनिवार्य हो; शासकीय एटीएस/डैशबोर्ड से मॉनिटरिंग संभव हो।
- दंड व्यवस्था: बार-बार अनुत्तरदायी अधिकारियों पर नोटिस, कटौती/वार्निंग से लेकर प्रमोशन रोकने तक सख्त कार्रवाई के प्रावधान।
- सहायक प्रशिक्षण व अवेयरनेस: डिजिटल टूल्स, आपातकारिणी प्रक्रियाओं और जनसंपर्क में बेहतर प्रशिक्षण अनिवार्य करें।
विशेष सलाह:
- आपात स्थिति में नागरिकों को एक सिंगल, सार्वजानिक आपात नंबर या पोर्टल से जोड़ें—ताकि मामले का ऑडिट ट्रेल रहे।
- विभागीय हायरार्की में शालीनता के साथ साथ जवाबदेही का क्लियर मैट्रिक्स बनाएं, ताकि किसी भी मामले में जिम्मेदारी तय की जा सके।
नज़रिए से एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी का कथन (काल्पनिक उद्धरण):
“जनता की आवाज़ पर त्वरित प्रतिक्रिया न सिर्फ प्रशासन की छवि बल्कि जीवन रक्षा की जिम्मेदारी भी है। हमें तंत्र को कठोर बनाकर, जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।”
नतीजा:
सरकार अगर जल्द और निर्णायक कदम नहीं उठाती, तो न सिर्फ आम जनता की परेशानी बढ़ेगी बल्कि प्रशासनिक विश्वसनीयता भी कमजोर पड़ेगी। ऐसे में मामूली दिखने वाले नियम—जैसे कॉल उठाना—वास्तव में बड़े सुधार की दिशा में पहला कदम बन सकते हैं।



