पर्यटन नगरी लैंसडौन का नाम बदलने की चर्चा, स्थानीय लोग बोले– पहले विकास जरूरी

लैंसडौन (पौड़ी गढ़वाल)। पर्यटन नगरी लैंसडौन, जो राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान रखती है, एक बार फिर नाम परिवर्तन की चर्चा को लेकर सुर्खियों में है। क्षेत्र में पर्यटन उद्योग लगातार बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का राजस्व मिल रहा है।
नाम बदलने की कवायद से बढ़ी बहस
ब्रिटिश काल में स्थापित इस नगर का नाम बदलने की प्रक्रिया को लेकर प्रशासन ने सार्वजनिक नोटिस जारी कर जनता से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की हैं। इससे क्षेत्र में नई बहस शुरू हो गई है कि क्या केवल नाम बदलने से विकास संभव है या बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।
विकास की कमी और पलायन की समस्या
स्थानीय लोगों का कहना है कि लैंसडौन कैंट क्षेत्र होने के कारण विकास कार्यों में लगातार बाधाएं आती हैं। रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी के चलते क्षेत्र में पलायन बढ़ रहा है।
कैंट प्रशासन के आर्थिक संकट और बजट कटौती के कारण कई विकास योजनाएं फाइलों में ही अटकी पड़ी हैं।
पहले भी हो चुकी है नाम बदलने की चर्चा
लैंसडौन का नाम बदलने को लेकर पहले भी कई प्रस्ताव सामने आ चुके हैं। कभी इसका नाम “कालौडांडा” रखने की मांग उठी, तो कभी लाट सूबेदार बलभद्र सिंह नेगी या सीडीएस स्व. विपिन रावत के नाम पर नगर का नाम रखने की चर्चाएं हुईं। हालांकि कोई भी प्रस्ताव अंतिम रूप नहीं ले पाया।
स्थानीय लोगों की राय
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि लैंसडौन का नाम केवल एक पहचान नहीं बल्कि भावनात्मक जुड़ाव है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डा. एसपी नैथानी ने कहा कि यदि नाम बदलने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो इसका विरोध किया जाएगा।
मुख्य मुद्दा: नाम या विकास?
वर्तमान में क्षेत्र में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नाम बदलने से विकास की राह खुलेगी या फिर सरकार को पहले बुनियादी सुविधाओं और रोजगार के अवसरों पर ध्यान देना चाहिए।



